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मंगलवार, 24 मई 2011

समीक्षा - नया ज्ञानोदय, मई २०११

पत्रिका -           नया ज्ञानोदय 
अंक -              मई 2011
स्वरूप -            मासिक 
संपादक -          रवीन्द्र कालिया
मूल्य -             (यह विषेशांक - 50 रू) (सामान्य अंक - 30 रू) (वार्षिक 300रू.)
फोन/मोबाईल:    011.24626467
ई मेल -            jnanpith@satyam.net.in
वेबसाईट           http://www.jnanpith.net/
पत्राचार :          18, इन्स्टीट्यूटनल एरिया, लोदी रोड़, नई दिल्ली 11000

यह अंक लम्बी कहानियों और लम्बी कविताओं का विषेशांक है जिसमें ९ कहानियां और ३ कविताएँ हैं साथ ही प्रमुख स्थाई स्तंभ |

रश्मि रेखा में जानकी वल्लभ शास्त्री जी को याद करते हुए भाव-भीनी श्रद्धांजली  अर्पित की है

गुलज़ार ने  अपने स्तंभ 'मेरे अपने'  में अपने हमनाम गोरख पांडे (गोरे) को याद किया है


लम्बी कविताओं में प्रकाश शुक्ल की कविता 'अडीबाज़' प्रभावित करती है कुछ पंक्तियाँ देखें -
मूल्य इनके लिए तयशुदा माल नहीं है,
बल्कि यह नकार कि उन सभी संभावनाओं में दर्ज है
जिसे सुनकर पहली बार दुनिया को झटका लगता है 
यूं झटका देना इनकी नियति है 
और हर चीज को झटक कर चल देना इनकी गति 

अपने स्तंभ 'अनंतिम' में विजय मोहन सिंह शुरुआत अपने पूर्व प्रकाशित लेखों पर सफाई देते हुए की है, और आगे उन्होंने दो कहानियों कि सुन्दर समीक्षा प्रस्तुत कि है

अजय वर्मा 'आकलन' स्तंभ  के अंतर्गत युवा रचनाशीलता के विचारों को प्रस्तुत करते हैं, शुरुआत में वो कहते हैं -
                                                " नए कथाकारों में हम संभावनाए देख कर बातें करते रहे हैं पर अब मूल्यांकन की जरूरत महसूस होने लगी है क्योकि आज के तीव्र गति से बदलते समय में संभावना और मूल्यांकन के बीच का अंतराल भी कम हो गया है"

और मध्य में कहते हैं -
                                    "कथाकार का काम सिर्फ टूटते बिखरते जीवन का डाटा इकठ्ठा करना नहीं है उपदेश देना या निदान देना भी उसका काम नहीं है, पर उसके प्रति उसका रुख स्पष्ट होना चाहिए"

जिस विविधता के साथ अजय वर्मा ने शुरुआत की है अंत उतना रोचक नहीं बन सका है, लेखक ने लेख को कतिपय केन्द्रीय कर दिया है, एक व्यक्ति विशेष पर चर्चा केंद्रित हो गई है परिणाम स्वरूप कई नाम जिनका उल्लेख किया जा सकता था छूट गए, विचार सटीक और विश्लेषण समयानुकूल है, बधाई

ज्ञान चतुर्वेदी के स्थाई स्तंभ 'प्रत्यंचा' के व्यंग की धार हमेशा कि तरह तीखी है जो सब कुछ काटती हुई सांय से गुजर जाती है


कहानियाँ -
जिस कहानी ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया और जिस कहानी की वजह से यह अंक विशेष हो जाता है वह है अखिलेश कि 'श्रृंखला', कहानी समकालीन भारतीय जनता और राजनीतिक मनः स्थिति को व्यक्त करती है
अखिलेश को साधुवाद

  'श्रृंखला' कहानी पर अजय तिवारी का आलेख सामाजिक राजनीतिक ढाँचे की विस्तृत जांच पड़ताल करता है

उमा शंकर चौधरी की कहानी 'मिसेज़ वाटसन की भुतहा कोठी' में छठी पीढ़ी तक मिले अभिशाप को पांचवी पीढ़ी को तोडना ही पड़ता है क्योकि जीवन उतना सरल नहीं रह जाता, कि कठिनाई के साथ जिया जा सके

श्रीकान्त दूबे की 'गुरत्वाकर्षण'  रिश्तों की उठापटक के बीच मौन को जीने की कहानी है जहाँ मौन का सब कुछ खोता हुआ प्रतीत होता है और मौन कुछ नहीं कह सकता क्योकि उसकी नियति ही मौन रहना है | लेखक बधाई का पात्र है

अन्य कहानियों में चौथी, पांचवी और छठी कसम (पंकज सुबीर), दिल वाले दुल्हनियां ले जायेंगे (कुणाल सिंह) भी अपना प्रभाव छोडने में सक्षम हैं, दोनों कहानीकारों ने कतिपय नए विषय पर कलम चलाई है

आज रंग है (वन्दना राग), पवित्र सिर्फ एक शब्द है (विमल चंद्र पाण्डेय), कहीं कुछ नहीं(शशि भूषण द्विवेदी) यह कहानियां भी अच्छी बन पडी हैं|

गौरव सोलंकी कि कहानी 'ग्यारहवीं ए के लड़के' ने काफी निराश किया, अमूमन गौरव सोलंकी की कहानी स्तरीय होती है
इस कहानी से पत्रिका के संपादक महोदय भी नाखुश दिखे, क्योकि कालिया जी ने सम्पादकीय में इस कहानी के सन्दर्भ में कहा है -
                       
                                  "गौरव सोलंकी जिस राह पर चल पड़े हैं उस राह पर आगे यही पट्टिका है  -  'सावधान आगे खाई है'"